गठबंधन के दावे और शह-मात का खेल । 4th पिलर डेस्क
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर फिलहाल पूरी तरह साफ नहीं है। दोनों दल साथ चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे का फॉर्मूला अभी तय नहीं हुआ है। यही वजह है कि दोनों पार्टियां अपनी-अपनी तरफ से उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संगठन और चुनावी तैयारियों को मजबूत करने में जुटी हैं।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव कई मौकों पर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी उत्तर प्रदेश में सपा के साथ गठबंधन को लेकर सकारात्मक रुख जाहिर करता रहा है। हालांकि, दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या और सीटों के चयन को लेकर बातचीत का औपचारिक स्वरूप अभी सामने नहीं आया है।
इस बीच बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती कांग्रेस या समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं को पहले ही खारिज कर चुकी हैं। वहीं, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी सपा के साथ गठबंधन की इच्छा जाहिर करते रहे हैं। आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने भी गठबंधन के विकल्प खुले रखने की बात कही है, लेकिन उनकी पार्टी किस गठबंधन का हिस्सा बनेगी, इसे लेकर अभी कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है।

सीट शेयरिंग बना सबसे बड़ा मुद्दा
सपा और कांग्रेस के बीच सबसे बड़ी चर्चा सीटों के बंटवारे को लेकर है। कांग्रेस की ओर से यह संकेत दिए जा रहे हैं कि वह गठबंधन में अपनी सीटों का चयन खुद करना चाहती है और उन सीटों पर अपने उम्मीदवार भी तय करना चाहती है। पार्टी के भीतर यह मांग भी उठ रही है कि सीटों का बंटवारा चुनाव से काफी पहले हो, ताकि उम्मीदवारों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अपनी संगठनात्मक और चुनावी तैयारियों को पहले मजबूत करने के बाद सीट शेयरिंग पर बातचीत आगे बढ़ाने के पक्ष में दिखाई दे रही है। सपा की ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि गठबंधन में केवल सीटों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होगी, बल्कि उस सीट पर जीत की संभावना और स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होंगे।

कांग्रेस नेता और सांसद इमरान मसूद ने सीट शेयरिंग में जल्द निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि यदि गठबंधन में सीटों को लेकर फैसला देर से होता है, तो कांग्रेस की चुनावी तैयारियों पर असर पड़ सकता है। मसूद के मुताबिक, कांग्रेस ने बड़ी संख्या में संभावित सीटों की सूची सपा के साथ साझा की है। हालांकि, सपा की ओर से इस दावे की औपचारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
दोनों दलों की अपनी-अपनी तैयारी
सपा और कांग्रेस दोनों ही सार्वजनिक रूप से सभी 403 सीटों पर तैयारी की बात कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर इसे दोनों दलों की संगठनात्मक तैयारी के साथ-साथ संभावित सीट शेयरिंग में अपनी स्थिति मजबूत रखने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में दोनों दलों की संगठनात्मक स्थिति एक जैसी नहीं है। समाजवादी पार्टी का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग स्तर पर है, जबकि कांग्रेस लंबे समय से राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में सीटों के बंटवारे के दौरान स्थानीय संगठन, पिछले चुनावों के प्रदर्शन, उम्मीदवारों की स्थिति और क्षेत्रीय समीकरण जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अखिलेश यादव की ओर से यह संकेत दिया गया है कि गठबंधन में सीटों की संख्या से अधिक महत्व उस सीट पर जीत की संभावना का होगा। यानी जिस दल की जिस सीट पर मजबूत स्थिति होगी, उसे वहां से चुनाव लड़ने का मौका मिल सकता है।
बातचीत से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा अंतिम फॉर्मूला
फिलहाल सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की राजनीतिक इच्छा दिखाई दे रही है, लेकिन सीट शेयरिंग का अंतिम फॉर्मूला सामने नहीं आया है। कांग्रेस जहां जल्द सीटों की पहचान और उम्मीदवारों की तैयारी शुरू करना चाहती है, वहीं सपा सीटों के बंटवारे को लेकर अपेक्षाकृत समय लेने के पक्ष में नजर आ रही है।
दोनों पार्टियों के लिए चुनौती यह है कि गठबंधन की बातचीत को आगे बढ़ाते हुए अपने-अपने संगठन और संभावित उम्मीदवारों की तैयारियों को भी जारी रखा जाए। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों दल कितनी सीटों पर सहमति बनाते हैं और किन क्षेत्रों में किस पार्टी को चुनाव लड़ने का अवसर मिलता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर राजनीतिक संवाद जारी रखने की इच्छा दोनों तरफ दिखाई देती है, लेकिन सीटों का बंटवारा इस गठबंधन की सबसे अहम कड़ी बना हुआ है। चुनाव की तारीखों के करीब आने के साथ इस पर तस्वीर और स्पष्ट होने की संभावना है।
































